जानिए राम मंदिर के बारे में सब कुछ क्योकि हमारे प्रभु राम आने वाले हैं

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रामलला मंदिर – अयोध्या (Ram Mandir)

राम मंदिर और बाबरी मस्जिद के विवाद भारतीय इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण है।

थोड़ी खट्टी यादे

रामलला मंदिर विवाद की शुरुआत 1949 में हुआ थी, लेकिन 1949 में बाबरी मस्जिद के मुख्य गुंबद के ठीक नीचे वही मूर्ति निकली जो सदियों से राम चबूतरे पर विराजमान थी। इसके बाद भी, विवाद सालों तक चलता रहा, और भारतीय समाज में तनाव डालता रहा।

फिर 1992 में, बाबरी मस्जिद को गिराने के बाद तनाव और हिंसा और बढ़ गई। इसके बाद, हिन्दू समाज इस विवाद के समाधान के लिए कई सालों तक सुप्रीम कोर्ट के इंतजार में रहा।

सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में इस विवाद का निर्णय किया और रामलला की अपनी जन्मस्थली के लिए एक नया मंदिर बनाने का निर्णय किया गया और साथ में मुस्लिम समाज को मस्जिद बनाने के लिए एक बड़ी जमीन दी गयी है।

इसके बाद, अयोध्या में श्रीराम मंदिर की नींव रखी गई और अब उसका निर्माण शुरू हो चुका है।

राम मंदिर के लिए कुल 67 एकड़ जमीन है, जिसें 2 एकड़ में मंदिर बन रहा है। पहले मंदिर के मुख्य शिखर की ऊंचाई 128 फीट थी लेकिन अब यह 161 फीट होगी और पांच गुंबद के मंदिर में एक मुख्य शिखर होगा।

इस मंदिर में रामलला मंदिर में श्रीराम के बाल स्वरूप की पूजा होती थी, होगी और होती रहेगी। 22 जनवरी 2024 को अयोध्या में बन रहे, भव्य श्रीराम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा होगी।

अयोध्या के श्रीराम मंदिर का इतिहासतीर्थ नगरी अयोध्या को सतयुग में वैवस्वत मनु ने बसाया था. यहीं प्रभु श्रीराम का जन्म हुआ जो वाल्मीकि की रामायण में भी लिखा हुआ है। मगर जब श्रीराम ने जल समाधि ले ली तो अयोध्य नगरी सूनी हो गई.

उज्जयिनी के राजा विक्रमादित्य जब यहां शिकार करने आए तो उन्हें कुछ चमत्कार दिखाई देने लगे, खोज की तो पता चला कि ये श्रीराम की अवध भूमि है। इसके बाद उन्होंने यहां श्रीराम के भव्य मंदिर का निर्माण कराया, जिसमें काले रंग के कसौटी पत्थर वाले 84 स्तंभ थे।

समय-समय पर यहां राजाओं ने मंदिर की देखभाल की लेकिन 14वीं शताब्दी में जब भारत में मुगलों का शासन हुआ, तो 1525 में बाबर के सेनापति मीर बांकी ने श्रीराम जन्मभूमि को नष्ट कर वहां बाबरी मंजिद बनवा दी।

मगर अब इस भारत की धरती पर सत्य की जीत की शुरुवात हो गयी है।


जाने रामलला की मूर्ति के बारे में सब कुछ

कैसी मूर्ति चाहिए थी

मूर्ति बनाने से पहले पुर्तिकारो से कहा गया था, मूर्ति की कुल लम्बाई 51 इंच की होनी चाहिए, मस्तक सुंदर, बड़े और ललाट वाली खड़ी मुद्रा में मूर्ति जिसके हाथ में तीर और धनुष होनी चाहिए और मूर्ति में पांच साल के बच्चे की बाल सहज कोमलता झलके

इस तरह तैयार हुई मूर्ति

बता दें कि मंदिर के अंदर की श्री राम की खड़ी मूर्ति को तैयार किया गया है। इसके लिए पहले से ही शिल्पकारों को बताया गया था कि उसी के हिसाब से इस मूर्ति को तैयार किया जाएगा, ताकि अगर कोई देखे तो वो यही कहे कि इसमें रामलला के बाल का स्वरूप नजर आ रहा है। इसके लिए रोजाना 12 घंटे तक काम करके इस मूर्ति को तैयार किया और मंदिर के निर्माण को अंतिम रूप दिया।

मिनिस्टर सेंट्रल ने एक्स पर लिखी ये बात

“जहां राम हैं, वहां हनुमान हैं” ऐसा लिखा केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी जी ने एक्स पर उसके बाद मूर्तियों का चयन शुरू हुआ।

मूर्ति का चयन 1 जनवरी को हुआ

मूर्ति तराशने के लिए श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र की ओर से तीन मूर्तिकारों का चुनाव किया गया था। तीनों मूर्तिकार अलग-अलग प्रतिमाएं बना रहे थे

जिसमें से अरुण योगीराज की मूर्ति को राम मंदिर में स्थापित करने की चर्चा हो रही है। उन्होंने श्याम रंग की मूर्ति को तराशा है। मूर्तिकार अरुण योगीराज के द्वारा निर्मित प्रतिमा की कई खासियत है, जिसके कारण उनकी मूर्ति का चयन हो सकता है

सोमवार (1 जनवरी) को केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी जी ने दावा किया कि हस्तशिपी योगीराज अरुण के द्वारा बनायीं गयी भगवान राम की मूर्ति का चयन कर लिया गया है.


रामलला की मूर्ति बनाने वाले हस्तशिल्प कौन है ?

अरुण योगीराज कौन हैं?

अरुण योगीराज प्रसिद्ध मूर्तिकारों के परिवार से हैं। वह अपने परिवार की पांचवी पीढ़ी के मूर्तिकार हैं। उनके पिता योगीराज शिल्पी और दादा बसवन्ना शिल्पी भी एक बेहतरीन मूर्तिकार थे। अरुण के पिता गायत्री और गौरी मंदिर के लिए भी काम कर चुके हैं।

कितना पढ़े लिखे हैं अरुण योगीराज?

अरुण योगीराज कर्नाटक के मैसूर के रहने वाले हैं। मूर्तिकार परिवार से होने के कारण अरुण योगीराज बचपन से ही मूर्तिकला के काम से जुड़े थे। हालांकि उन्होंने विश्वविद्यालय से एमबीए की पढ़ाई पूरी की और करियर की शुरुआत एक प्राइवेट कंपनी में काम करके की और बाद में वह अपने अंदर के मूर्तिकार को रोक न सके और नौकरी छोड़कर 2008 में मूर्तिकला के क्षेत्र में काम करना शुरू किया।

अरुण योगीराज का बतौर मूर्तिकार

अरुण योगीराज ने इसके पहले दिल्ली के इंडिया गेट पर अमर जवान ज्योति के पीछे सुभाष चंद्र बोस की 30 फीट ऊंची प्रतिमा बनाई थी और इस मूर्ति को भव्य छतरी के नीचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्थापित किया था।
इसके अलावा केदारनाथ धाम में स्थापित आदि शंकराचार्य की 12 फीट ऊंची प्रतिमा भी अरुण योगीराज ने ही बनाई है।
और मैसूर में 21 फीट ऊंची हनुमान प्रतिमा को भी उन्होंने ही तराशा था।
वर्तमान में अरुण योगीराज देश के सबसे अधिक व्यस्त मूर्तिकारों में से एक माने जाते हैं।

उन्होंने भी इसी तरह की मूर्तियों को आगे बढ़ाया और मूर्तियां बनाकर उनकी कला को पूरे देश में प्रसिद्धि दिलाई।

आपको बता दें कि, ये आपके परिवार की पांचवी पीढ़ी के मूर्तिकार हैं। उनके पिता ने सबसे पहले इस पर काम किया था। अब ऐसा ही खास मौका मिला जहां उन्होंने राम मंदिर के लिए भगवान राम की मूर्ति तैयार की। अब वही प्रतिमा मंदिर के अंदर मिलेगी।

अरुण योगीराज की उपलब्धियां

मूर्तिकार अरुण योगीराज को कला क्षेत्र में उनके सराहनीय कार्य के लिए कई संस्थाएं सम्मानित कर चुकी हैं। मैसूर के शाही परिवार ने भी उन्हें विशेष सम्मान दिया है। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र संगठन के पूर्व महासचिव कोफी अन्नान ने उनकी कार्यशाला का दौरा करके सराहना की थी।

मैसूर जिला प्रशासन ने नलवाड़ी पुरस्कार 2020, कर्नाटक शिल्प परिषद ने 2021 में मानद सदस्यता, भारत सरकार द्वारा साउथ जोन यंग टैलेंटेड आर्टिस्ट अवार्ड 2014, शिल्पा कौस्तुभा पुरस्कार, मैसूर जिले की खेल अकादमी से सम्मानित और कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने सम्मानित किया है।

योगीराज एक जाना-माना नाम है और सोशल मीडिया पर उनके काफी फैन फॉलोइंग हैं। प्रसिद्ध मूर्तिकार योगीराज शिल्पी के पुत्र 37 वर्ष के अरुण योगीराज मयुसु महल के शिल्पकारों के परिवार से आते हैं।

बेटे की मूर्ति का चयन होने पर मां ने रखी खुशी

योगीराज की मां सरस्वती ने कहा, “यह हमारे लिए सबसे बड़ी खुशी है। मैं उन्हें रामलला की मूर्ति को तराशते और देखने के लिए कहती थी, उन्होंने कहा कि वह मुझे रामलला के दर्शन के लिए ले जाएंगे।

अंतिम दिन में मैं आख़िरकार राम मंदिर में इसकी भव्य स्थापना के दिन की मूर्ति को अपनी नजरों से पाऊँगी।


रामलला की मूर्ति के लिए कैसे हुई तैयारी

अचल मूर्ति के लिए मांगे गए थे 12 पत्थर

रामलला की अचल मूर्ति निर्माण के लिए नेपाल की गांधी नदी सहित कर्नाटक, राजस्थान और उड़ीसा के उच्च गुणवत्ता वाले 12 पत्थर के ट्रस्ट मांगे गए थे। इन सभी मंदिरों को खोजा गया तो राजस्थान और कर्नाटक की शिला ही मूर्ति निर्माण के लिए मिलीं।

ऐसा हुआ था कर्नाटक और राजस्थान की शिला का चयन

मकराना की श्याम शिला और राजस्थान के मकराना की श्याम शिला को विभिन्न विशेष संप्रदायों के बीच चुना गया था। मकराना की शिला बहुत कठोर होती है और बनाने के लिए सबसे अच्छी होती है। इसकी चमक सदियों तक रहती है। जहां कर्नाटक की श्याम शिला से मूर्ति आसानी से बनती है। ये शिलाएं जलरोधी होती हैं, जिससे मूर्ति की आयु लंबी होती हैं।

पुरानी मूर्ति का क्या होगा?

अगर आपके मन में यह सवाल है कि अगर श्रीराम मंदिर में नई मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा होगी तो पुरानी मूर्ति की क्या होगा, तो हम आपको बता रहे हैं कि राम मंदिर के गर्भगृह में दो मूर्तियां रखी गई हैं। नई मूर्ति के साथ-साथ पुरानी मूर्ति भी वही स्थापित की जाएगी।

पुराने मूर्ति आकार में छोटा है, इसलिए भक्तों को यह दूर से दिखाई नहीं देता। वहीं नए मूर्तिमान भी रामलला के बाल स्वरूप हैं। लेकिन उसका आकार बड़ा है जिसे दूर से देखा जा सकता है। मुख्य पुजारी सत्येन्द्र दास 22 जनवरी को प्राण प्रतिष्ठा अनुष्ठान करेंगे।


मदिर बनने के बाद कैसा दिखेगा।


अयोध्या में निर्माणाधीन श्रीराम जन्मभूमि मंदिर की विशेषताएं:

  1. मंदिर परम्परागत नागर शैली में बनाया जा रहा है।
  2. मंदिर की लंबाई (पूर्व से पश्चिम) 380 फीट, चौड़ाई 250 फीट तथा ऊंचाई 161 फीट रहेगी।
  3. मंदिर तीन मंजिला रहेगा। प्रत्येक मंजिल की ऊंचाई 20 फीट रहेगी। मंदिर में कुल 392 खंभे व 44 द्वार होंगे।
  4. मुख्य गर्भगृह में प्रभु श्रीराम का बालरूप (श्रीरामलला सरकार का विग्रह), तथा प्रथम तल पर श्रीराम दरबार होगा।
  5. मंदिर में 5 मंडप होंगे: नृत्य मंडप, रंग मंडप, सभा मंडप, प्रार्थना मंडप व कीर्तन मंडप
  6. खंभों व दीवारों में देवी देवता तथा देवांगनाओं की मूर्तियां उकेरी जा रही हैं।
  7. मंदिर में प्रवेश पूर्व दिशा से, 32 सीढ़ियां चढ़कर सिंहद्वार से होगा।
  8. दिव्यांगजन एवं वृद्धों के लिए मंदिर में रैम्प व लिफ्ट की व्यवस्था रहेगी।
  9. मंदिर के चारों ओर चारों ओर आयताकार परकोटा रहेगा। चारों दिशाओं में इसकी कुल लंबाई 732 मीटर तथा चौड़ाई 14 फीट होगी।
  10. परकोटा के चारों कोनों पर सूर्यदेव, मां भगवती, गणपति व भगवान शिव को समर्पित चार मंदिरों का निर्माण होगा। उत्तरी भुजा में मां अन्नपूर्णा, व दक्षिणी भुजा में हनुमान जी का मंदिर रहेगा।
  11. मंदिर के समीप पौराणिक काल का सीताकूप विद्यमान रहेगा।
  12. मंदिर परिसर में प्रस्तावित अन्य मंदिर- महर्षि वाल्मीकि, महर्षि वशिष्ठ, महर्षि विश्वामित्र, महर्षि अगस्त्य, निषादराज, माता शबरी व ऋषिपत्नी देवी अहिल्या को समर्पित होंगे।
  13. दक्षिण पश्चिमी भाग में नवरत्न कुबेर टीला पर भगवान शिव के प्राचीन मंदिर का जीर्णो‌द्धार किया गया है एवं तथा वहां जटायु प्रतिमा की स्थापना की गई है।
  14. मंदिर में लोहे का प्रयोग नहीं होगा। धरती के ऊपर बिलकुल भी कंक्रीट नहीं है।
  15. मंदिर के नीचे 14 मीटर मोटी रोलर कॉम्पेक्टेड कंक्रीट (RCC) बिछाई गई है। इसे कृत्रिम चट्टान का रूप दिया गया है।
  16. मंदिर को धरती की नमी से बचाने के लिए 21 फीट ऊंची प्लिंथ ग्रेनाइट से बनाई गई है।
  17. मंदिर परिसर में स्वतंत्र रूप से सीवर ट्रीटमेंट प्लांट, वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट, अग्निशमन के लिए जल व्यवस्था तथा स्वतंत्र पॉवर स्टेशन का निर्माण किया गया है, ताकि बाहरी संसाधनों पर न्यूनतम निर्भरता रहे।
  18. 25 हजार क्षमता वाले एक दर्शनार्थी सुविधा केंद्र (Pilgrims Facility Centre) का निर्माण किया जा रहा है, जहां दर्शनार्थियों का सामान रखने के लिए लॉकर व चिकित्सा की सुविधा रहेगी।
  19. मंदिर परिसर में स्नानागार, शौचालय, वॉश बेसिन, ओपन टैप्स आदि की सुविधा भी रहेगी।
  20. मंदिर का निर्माण पूर्णतया भारतीय परम्परानुसार व स्वदेशी तकनीक से किया जा रहा है। पर्यावरण-जल संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। कुल 70 एकड़ क्षेत्र में 70% क्षेत्र सदा हरित रहेगा।

श्री राम के 108 नाम

  1. श्रीराम: – जिनमें योगी जन रमण करते हैं, ऐसे सच्चिदानन्दघं स्वरूप श्री राम या सीता-सहित राम
  2. रामचन्द्र: – चंद्रमा के समान आनन्दमयी और मनोहर राम
  3. रामभद्र: – कल्याणमय राम
  4. शाश्वत: :- सनातन राम
  5. राजीवलोचन:- कमल के समान आँखों वाले
  6. श्रीमान् राजेन्द्र:- श्री सम्पन्न राजाओं के भी राजा, चक्रवर्ती सम्राट
  7. रघुपुङ्गव:- रघुकुल में श्रेष्ठ
  8. जानकीवल्लभ:- जनक किशोरी सीता के प्रियतम
  9. जैत्र: – विजयशील
  10. जितामित्र:- शत्रुओं को जीतने वाल
  11. जनार्दन:- सम्पूर्ण मनुष्यों द्वारा याचना करने योग्य
  12. विश्वामित्रप्रिय:-विश्वामित्र जी के प्रियतम
  13. दांत:- जितेंद्रिय
  14. शरण्यत्राणतत्पर:- शरणागतों के रक्षा में तत्पर
  15. बालिप्रमथन:- बालि नामक वानर को मारनेवाले
  16. वाग्मी- अच्छे वक्ता
  17. सत्यवाक्- सत्यवादी
  18. सत्यविक्रम:- सत्य पराक्रमी
  19. सत्यव्रत:- सत्य का दृढ़ता पूर्वक पालन करने वाले
  20. व्रतफल:- सम्पूर्ण व्रतों के प्राप्त होने योग्य फलस्वरूप
  21. सदा हनुमदाश्रय:- निरंतर हनुमान जी के आश्रय अथवा हनुमानजी के ह्रदयकमल में निवास करने वाले
  22. कौसलेय:- कौसल्याजी के पुत्र
  23. खरध्वंसी :- खर नाम के राक्षस का नाश करने वाले
  24. विराधवध-पण्डित:- विराध नामक दैत्य का वध करने में कुशल
  25. विभीषण-परित्राता- विभीषण के रक्षक
  26. दशग्रीवशिरोहर:- दशशीश रावण के मस्तक काटनेवाले
  27. सप्ततालप्रभेता – सात ताल वृक्षों को एक ही बाण से बींध डालनेवाले
  28. हरकोदण्ड- खण्डन:- जनकपुर में शिवजी के धनुष को तोड़नेवाले
  29. जामदग्न्यमहादर्पदलन:- परशुरामजी के महान अभिमान को चूर्ण करनेवाले
  30. ताडकान्तकृत- ताड़का नामवाली राक्षसी का वध करनेवाले
  31. वेदान्तपार:- वेदान्त के पारंगत विद्वान अथवा वेदांत से भी अतीत
  32. वेदात्मा:- वेदस्वरूप
  33. भवबन्धैकभेषज:- संसार बन्धन से मुक्त करने के लिये एकमात्र औषधरूप
  34. दूषणप्रिशिरोsरि:- दूषण और त्रिशिरा नामक राक्षसों के शत्रु
  35. त्रिमूर्ति:- ब्रह्मा,विष्णु और शिव- तीन रूप धारण करनेवाले
  36. त्रिगुण:- त्रिगुणस्वरूप अथवा तीनों गुणों के आश्रय
  37. त्रयी- तीन वेदस्वरूप
  38. त्रिविक्रम:- वामन अवतार में तीन पगों से समस्त त्रिलोकीको नाप लेनेवाले
  39. त्रिलोकात्मा- तीनों लोकों के आत्मा
  40. पुण्यचारित्रकीर्तन:- जिनकी लीलाओं का कीर्तन परम पवित्र हैं, ऐसे
  41. त्रिलोकरक्षक:- तीनों लोकोंकी रक्षा करनेवाले
  42. धन्वी- धनुष धारण करनेवाले
  43. दण्डकारण्यवासकृत्- दण्डकारण्य में निवास करनेवाले
  44. अहल्यापावन:- अहल्याको पवित्र करनेवाले
  45. पितृभक्त:- पिता के भक्त
  46. वरप्रद:- वर देनेवाले
  47. जितेन्द्रिय:- इन्द्रियों को काबू में रखनेवाले
  48. जितक्रोध:- क्रोध को जीतनेवाले
  49. जितलोभ:- लोभ की वृत्ति को परास्त करनेवाले
  50. जगद्गुरु:- अपने आदर्श चरित्रोंसे सम्पूर्ण जगत् को शिक्षा देनेके कारण सबके गुरु
  51. ऋक्षवानरसंघाती:- वानर और भालुओं की सेना का संगठन करनेवाले
  52. चित्रकूट – समाश्रय:- वनवास के समय चित्रकूट पर्वत पर निवास करनेवाले
  53. जयन्तत्राणवरद:- जयन्त के प्राणों की रक्षा करके उसे वर देनेवाले
  54. सुमित्रापुत्र- सेवित:-सुमित्रानन्दन लक्ष्मण के द्वारा सेवित
  55. सर्वदेवाधिदेव:‌- सम्पूर्ण देवताओं के भी अधिदेवता
  56. मृतवानरजीवन:- मरे हुए वानरों को जीवित करनेवाले
  57. मायामारीचहन्ता- मायामय मृग का रूप धारण करके आये हुए मारीच नामक राक्षस का वध करनेवाले
  58. महाभाग:- महान सौभाग्यशाली
  59. महाभुज:- बड़ी- बड़ी बाँहोंवाले
  60. सर्वदेवस्तुत:- सम्पूर्ण देवता जिनकी स्तुति करते हैं, ऐसे
  61. सौम्य:- शांतस्वभाव
  62. ब्रह्मण्य:- ब्राह्मणों के हितैषी
  63. मुनिसत्तम:- मुनियोंमे श्रेष्ठ
  64. महायोगी- सम्पूर्ण योगोंके अधीष्ठान होने के कारण महान योगी
  65. महोदर:- परम उदार
  66. सुग्रीवस्थिर-राज्यपद:- सुग्रीव को स्थिर राज्य प्रदान करनेवाले
  67. सर्वपुण्याधिकफलप्रद:-सम्स्त पुण्यों के उत्कृष्ट फलरूप
  68. स्मृतसर्वाघनाशन:- स्मरण करनेमात्र से ही सम्पूर्ण पापों का नाश करनेवाले
  69. आदिपुरुष: – ब्रह्माजीको भी उत्पन्न करनेके कारण सब के आदिभूत अन्तर्यामी परमात्मा
  70. महापुरुष:- समस्त पुरुषों मे महान
  71. परम: पुरुष:- सर्वोत्कृष्ट पुरुष
  72. पुण्योदय:- पुण्य को प्रकट करनेवाले
  73. महासार:- सर्वश्रेष्ठ सारभूत परमात्मा
  74. पुराणपुरुषोत्तम:- पुराणप्रसिद्ध क्षर-अक्षर पुरुषोंसे श्रेष्ठ लीलापुरुषोत्तम
  75. स्मितवक्त्र:- जिनके मुखपर सदा मुस्कानकी छटा छायी रहती है, ऐसे
  76. मितभाषी- कम बोलनेवाले
  77. पूर्वभाषी – पूर्ववक्ता
  78. राघव:- रघुकुल में अवतीर्ण
  79. अनन्तगुण गम्भीर:- अनन्त कल्याणमय गुणों से युक्त एवं गम्भीर
  80. धीरोदात्तगुणोत्तर:- धीरोदात्त नायकके लोकोतर गुणों से युक्त
  81. मायामानुषचारित्र:- अपनी मायाका आश्रय लेकर मनुष्योंकी-सी लीलाएँ करनीवाले
  82. महादेवाभिपूजित:- भगवान शंकर के द्वारा निरन्तर पूजित
  83. सेतुकृत- समुद्रपर पुल बाँधनेवाले
  84. जितवारीश:- समुद्रको जीतनेवाले
  85. सर्वतीर्थमय:- सर्वतीर्थस्वरूप
  86. हरि:- पाप-ताप को हरनेवाले
  87. श्यामाङ्ग:- श्याम विग्रहवाले
  88. सुन्दर:- परम मनोहर
  89. शूर:- अनुपम शौर्यसे सम्पन्न वीर
  90. पीतवासा:- पीताम्बरधारी
  91. धनुर्धर:- धनुष धारण करनेवाले
  92. सर्वयज्ञाधिप:- सम्पूर्ण यज्ञों के स्वामी
  93. यज्ञ:- यज्ञ स्वरूप
  94. जरामरणवर्जित:- बुढ़ापा और मृत्यु से रहित
  95. शिवलिंगप्रतिष्ठाता- रामेश्वर नामक ज्योतिर्लिंग की स्थापना करनेवाले
  96. सर्वाघगणवर्जित:‌ – समस्त पाप-राशियों से रहित
  97. परमात्मा- परमश्रेष्ठ, नित्यशुद्ध-बुद्ध –मुक्तस्वरूपा
  98. परं ब्रह्म- सर्वोत्कृष्ट, सर्वव्यापी एवं सर्वाधिष्ठान परमेश्वर
  99. सच्चिदानन्दविग्रह:- सत्, चित् और आनन्द ही जिनके स्वरूप का निर्देश करानेवाला है, ऐसे परमात्मा अथवा सच्चिदानन्दमयदिव्यविग्रह
  100. परं ज्योति:- परम प्रकाशमय,परम ज्ञानमय
  101. परं धाम- सर्वोत्कृष्ट तेज अथवा साकेतधामस्वरूप
  102. पराकाश:- त्रिपाद विभूतिमें स्थित परमव्योम नामक वैकुण्ठधामरूप, महाकाशस्वरूप ब्रह्म
  103. परात्पर:- पर- इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदि से भी परे परमेश्वर
  104. परेश:- सर्वोत्कृष्ट शासक
  105. पारग:- सबकोपार लगानेवाले अथवा मायामय जगत की सीमा से बाहर रहनेवाले
  106. पार:- सबसे परे विद्यमान अथवा भवसागर से पार जाने की इच्छा रखनेवाले प्राणियों के प्राप्तव्य परमात्मा
  107. सर्वभूतात्मक:- सर्वभूतस्वरूप
  108. शिव:- परम कल्याणमय

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